भारत में आरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है, यूँ तो वैदिक काल से प्रचलित वर्ण व्यवस्था को आरक्षण का जनक कहा जाता है, मगर तार्किक दृष्टि से यह आरक्षण के वर्तमान स्वरुप से भिन्न है; वर्ण व्यवस्था में पिता के व्यवसाय का अधिकार स्वयं ही पुत्र को मिल जाता था। लेकिन भारत में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था वर्ण व्यवस्था से भिन्न है। भारत की आरक्षण व्यवस्था की वास्तविक शुरुआत आज़ादी और संविधान निर्माण से बहुत पहले शुरू हो गयी थी। ब्रिटिश राज में विंध्य राज्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े भाग में पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षण भारत के आज़ाद होने से पहले से जारी था। महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग की गरीबी को दूर करने और राजकीय प्रशासन में उन्हें हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण शुरू किया था। महाराष्ट्र के कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए सन 1902 में जो अधिसूचना जारी की गयी थी, वह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों को आरक्षण प्रदान करने वाला सरकारी आदेश था।

लेकिन भारत में आरक्षण को लेकर मांग व आंदोलन बहुत पहले से शुरू हो चुके थे। 1882 में महात्मा ज्योतिबा फुले ने पहली बार पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की मांग की, महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के लिए तथा सरकारी नौकरियों में दलित वर्ग के प्रतिनिधित्व के लिए आनुपातिक आरक्षण की मांग की। इस मांग पर 1882 हंटर आयोग की नियुक्ति हुई।
हंटर आयोग:
1882 में ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन द्वारा हंटर शिक्षा आयोग की स्थापना की गई थी। चार्ल्सवुड के घोषणा पत्र द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार ने विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में हंटर आयोग की नियुक्ति की थी। अंग्रेजी सदस्यों के अलावा इस आयोग में 8 भारतीय सदस्य भी शामिल थे। हालांकि हंटर शिक्षा आयोग को प्राथमिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा तक ही सीमित किया गया था।आयोग की रिपोर्ट ने तत्कालीन भारत की शिक्षा नीति तय करने में निर्णायक भूमिका अदा की। साथ ही सहायता और अनुदान प्रणाली प्रचलित की गई।

वहीं 1891 में त्रावणकोर के सामंती राज में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी कर विदेशी नागरिकों को नौकरी देने के खिलाफ प्रदर्शन किया गया, साथ ही मूल निवासियों के लिए आरक्षण की मांग भी की गई। मगर आरक्षण देने की शुरुआत बीसवीं सदी के आरम्भ में महाराष्ट्र की रियासत कोल्हापुर में छत्रपति शाहूजी महाराज के राज्य में हुई। छत्रपति शाहूजी महाराज ने 1902 में सरकारी अधिसूचना जारी की जिसमें सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में पहले से जारी आरक्षण की ही तरह आरक्षण दिया जाना प्रस्तावित हुआ।

राजा और रियासतों के बाद 1908 में ब्रिटिश शासन द्वारा पहली बार आरक्षण दिया गया। यह आरक्षण उन समुदायों को दिया गया जिनका प्रशासन में एक बड़ा हिस्सा था इन में मुसलमान भी शामिल थे। 1909 में भारत अधिनियम 1909 के द्वारा आरक्षण के प्रावधानों को रखा गया, इसके दस वर्षों बाद 1919 में मोंटगु-चेम्सफोर्ड सुधारों को शुरू किया गया और भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान रखा गया। 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने एक अलग तरह का आज्ञापत्र जारी किया, इस सरकारी आज्ञापत्र में गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।

आरक्षण के जरिये पिछड़ों को लुभाने की कोशिश में कांग्रेस कब तक पीछे रहती, सो 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें दलित जातियों के लिए अलग से निर्वाचित क्षेत्र आवंटित किए गए। इसे पूना समझौता के नाम से जाना जाता है, कहा गया कि यह आरक्षण प्रावधान दलितों को प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है।
इसके बाद 1942 में डॉ० भीमराव अंबेडकर द्वारा अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय महासंघ की स्थापना की गयी। इसके जरिये उनके द्वारा सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में दलितों और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की मांग की गयी। उनकी इस मांग के बाद से ही वास्तव में आजाद भारत में जारी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की नींव पड़ी।
1946 में कैबिनेट मिशन तथा अन्य सिफारिशों के साथ पिछड़ा वर्ग के अनुपात को ध्यान में रखते हुए आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव पास किया गया।
1947 में जब भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की उसके बाद डॉ० भीमराव अंबेडकर संविधान के लिए मसौदा समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए, और भारत का संविधान लागू किया गया। जैसा कि हम जानते हैं भारतीय संविधान धर्म जाति और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष प्रावधान करता है। बस संविधान की यही प्रकृति भारत में आरक्षण आधार बन गयी और इसी का हवाला देकर आरक्षण को मनमाफिक बढ़ाया जाता रहा है।
देखा गया है आरक्षण समर्थक वर्ण व्यवस्था का तर्क देकर आरक्षण को सही ठहराते हैं , मगर यह कहां का न्याय है पूर्व में हुए भेदभाव और शोषण का बदला वर्तमान पीढ़ी से शोषण के रूप में ही लिया जाए; भारत एक तेजी से बढ़ता हुआ राष्ट्र है जिसके समक्ष कई बड़ी चुनौतियां है और अन्य राष्ट्रों की तुलना में स्वयं को स्थापित करने के लिए बड़े सुधारों की आवश्यकता भी है। ऐसे में आरक्षण की बेड़ियां देश की प्रगति में बाधक हैं, यदि हम आज भी जाति और समुदायों में विभाजित होकर एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आरक्षण का समर्थन करेंगे तो एक विकसित राष्ट्र के रुप में कभी स्थापित नहीं हो सकते; आरक्षण का इतिहास चाहे वर्ण व्यवस्था हो या छत्रपति शाहूजी महाराज, हमें इसको समाप्त कर देश की प्रगति का मार्ग बनाना ही होगा।