अगर आप यह सोचते हैं कि मंडल कमीशन की सिफारिशों को मानते हुए OBC तबके को दिया गया 27 फीसदी आरक्षण, पिछड़ी जातियों के कल्याण की सद्भावना, विचार विमर्श और विशेष अध्ययन के बाद लिया गया था, तो आप गलत हैं।
यहां हम आपको अवगत कराएंगे मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने की पृष्ठभूमि में हुए उस खेल के बारे में जिसे भारत के पिछड़े वर्ग के कल्याण का सबसे बड़ा फैसला बताया जाता है! मंडल कमीशन के लागू होने से उपजी आरक्षण व्यवस्था की यह कहानी शुरू होती है 12 अप्रैल 1987 से, स्थान था प्रधानमंत्री कार्यालय; जहाँ तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके रक्षा मंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के बीच चर्चा चल रही थी। उस समय बोफोर्स घोटाले का मुद्दा जोरों पर था स्वीडन के रेडियो ने इस घोटाले का खुलासा किया था, आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की है, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला, आरोप यह भी था कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी, जिसमें कांग्रेस के कई बड़े नेता भी शामिल थे। कहा जाता है कि वी पी सिंह इन्ही आरोपों को लेकर नाराज़ थे, और राजीव गाँधी से हुई उस मुलाक़ात में यह नाराज़गी चरम पर पहुंच गयी और वी पी सिंह उठ कर चले गए। हालांकि वीपी सिंह ने कांग्रेस छोड़ी नहीं थी, मगर इस मुलाक़ात के बाद राजीव गाँधी ने वीपी सिंह को रक्षा मंत्री पद से हटा दिया।
यह बर्खास्तगी ही वीपी सिंह के लिए बड़ा वरदान साबित हुई, क्यों कि इसके बाद उन्होंने इस बात का प्रचार करना शुरू कर दिया कि “कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ, अपने सिद्धांतों से समझौता न करने वाले वीपी सिंह ने रक्षा मंत्री की कुर्सी तक में लात मार दी”, अब वीपी सिंह को ईमानदारी की मिसाल के तौर पर प्रचारित किया जाने लगा था, और जनता ने इसे हाथों-हाथ लिया भी! वीपी सिंह राजीव गाँधी के चेहरे के सामने एक बड़ा चेहरा बन कर उभर रहे थे! इस लोकप्रियता को वीपी सिंह ने एक आंदोलन में तब्दील कर लिया था, वे अपने भाषणों में कहते थे कि वे कोई राजनैतिक पार्टी नहीं बनाएंगे,बल्कि आंदोलन के सहारे ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई जारी रखेंगे! दरअसल वास्तविकता यह नहीं थी; वे चाहते थे कि जनता ही उनसे पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने की बात करे, ऐसा हुआ भी और वीपी सिंह ने एक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। मगर यहाँ वे हड़बड़ी में गड़बड़ी कर गए, उन्हें ऐसा लगा कि वे अकेले सरकार नहीं बना पाएंगे इसलिए उन्होंने आंदोलन का समर्थन कर रहे अन्य दलों जैसे जनता पार्टी, लोक दल और अपने जन मोर्चा को लेकर ‘जनता दल’ का गठन कर लिया और 1989 के लोकसभा चुनाव में उतर गए! दलों के इस गठजोड़ को देखते हुए जनता वीपी सिंह की राजनैतिक महत्वाकांक्षा समझ चुकी थी कि आंदोलन के बहाने सत्ता प्राप्ति की अभिलाषा की जा रही है! चुनाव प्रचार के दौरान वीपी सिंह अपनी जेब से एक पर्ची निकाल कर हवा में लहराते थे और कहते थे कि इस पर्ची में बोफोर्स के दलालों के नाम हैं, जिन्हें वे सरकार में आते ही जेल भिजवा देंगे; हालाँकि उनकी इस “जादुई पर्ची” का चमत्कार 143 सीटों के रूप में फलित तो हुआ मगर गठजोड़ वाली राजनीति जनता को अधिक रास ना आयी और कांग्रेस फिर से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। फिर भी वाम दलों और भाजपा के अनोखे सहयोग से वीपी सिंह 2 दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए।

लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने से लेकर मंडल कमीशन लागू करवाने में एक नाम और आता है वह है “देवीलाल चौटाला” का; दरअसल जब संसदीय दल का नेता चुना जाना था, तब देवीलाल को ही सभी सदस्यों ने प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वश्रेष्ठ नाम माना था; मगर वीपी सिंह द्वारा बिछाई गयी राजनीति में देवीलाल आ चुके थे और उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से वीपी सिंह का नाम आगे कर दिया, और खुद उपप्रधानमंत्री की तरह सरकार में शामिल हो गए। देवीलाल के मन में यह भर दिया गया था कि ऐसा करने पर वीपी सिंह आपके एहसान के तले दबे रहेंगे और आप बिना किसी जिम्मेवार बने प्रधानमंत्री की तरह कार्य करते रहेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और वीपी सिंह के कामकाज में देवीलाल कोई मनमानी न चला सके । वी पी सिंह सरकार में उपप्रधानमंत्री रहे देवीलाल से विश्वनाथ प्रताप सिंह की अनबन शुरू हो गई थी, दोनों में मतभेद बड़े स्तर तक बढ़ चुके थे। अंततः देवीलाल को मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद वीपी सिंह यह समझ चुके थे कि सरकार अब अधिक दिनों की मेहमान नहीं है। ऐसे में उन्हें कुछ ऐसा करना था जिससे सत्ता से बेदखल भी होना पड़े तो जनता के बीच एक शहीद की तरह दिखाई दें। वह जानते थे 9 अगस्त 1990 को उनके ही मंत्री रहे देवीलाल, दलित नेता कांशीराम के साथ जब उन पर आरोप लगाएंगे तो उनकी भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों से बनी बनाई छवि का बड़ा नुकसान हो जाएगा। वे डर गए थे कि जो हवा अब तक उन्होंने बना रखी थी वह देवीलाल और कांशीराम की संयुक्त रैली के सामने बौनी पड़ जायेगी। ऐसे में उन्हें वर्षों से कार्यालय में धूल फांक रही “मंडल कमीशन की रिपोर्ट” की याद आयी; वे समझ चुके थे कि देवीलाल के दांव को कैसे उल्टा किया जाए, क्यों कि मंडल कमीशन को लागू करने के बाद 52% पिछड़ों की आबादी के बीच वे रातों रात हीरो बन जाएंगे, और देवीलाल उनका विरोध करेंगे भी तो जनता उन्हें पिछड़ा विरोधी घोषित कर देगी। आनन-फानन में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 6 अगस्त 1990 को ही कैबिनेट की बैठक बुला ली; और यह प्रस्ताव रखा कि वह जल्द से जल्द मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करना चाहते हैं। लेकिन कैबिनेट में मौजूद कुछ मंत्रियों ने यह तर्क रखा मंडल कमीशन की रिपोर्ट में जिन जातियों का उल्लेख किया गया है वह 1931 की जनगणना पर आधारित हैं; मगर वर्तमान में स्वरूप काफी बदल चुका है। इसलिए जातियों की वर्तमान स्थिति की पुनः समीक्षा कर ही इसे लागू करना उचित होगा। मगर वी पी सिंह जानते थे मंडल कमीशन लागू हो या ना हो उनकी सरकार का जाना तय है तो क्यों न शहीद के रूप में सत्ता से बेदखल हुआ जाए। वे चाहते थे कि जितने समय के लिए सत्ता मिली है, उसका ऐसा प्रयोग करें कि आने वाली पीढ़ियों के बीच वीपी सिंह एक हीरो की तरह दिखाई दें। मीटिंग 6 अगस्त 1990 को खत्म हुई और 7 अगस्त 1990 मंडल कमीशन के लागू किए जाने की घोषणा कर दी गयी। यह कोई छोटा फैसला नहीं था; पूरा देश इससे प्रभावित होने वाला था; चयन प्रक्रिया से लेकर राजनीति तक सभी कुछ बदल जाना था। इन सब को ताक पर रखते हुए वी पी सिंह ने अपनी निजी महत्वकांक्षा में पूरे देश को आरक्षण की उस आग में धकेल दिया, जिसमें देश आज तक जल रहा है। जहां बात जातियों को साथ लेकर जातिवाद को खत्म करने की थी, मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने से जातियों के बीच आपसी संघर्ष बड़े स्तर तक पहुंच गया था। हर जाति अपना एक नेता चुन कर एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो चुकी थी। सवर्णों को लग रहा था कि यह आरक्षण उनका हक छीन रहा है; वहीं पिछड़े वर्ग को यह लग रहा था कि सवर्ण उन्हें बराबरी नहीं देना चाहते। आत्मदाहों के दौर चल रहे थे, दूसरी तरफ मंडल को बचाने में जातियों के नेता अपनी राजनीति चमका रहे थे। वीपी सिंह तो मंडल कमीशन को लागू कर सत्ता से बाहर हो गए, वे जैसा चाहते थे वैसे ही हीरो वाली छवि उन्होंने पिछड़े वर्ग के लोगों में हासिल भी कर ली; मगर यहां से देश में एक ऐसी राजनीति का उदय हुआ जिसमें पुराने सभी समीकरण बदल चुके थे। इसके बाद उपजे राजनेताओं ने इस दौर को सामाजिक न्याय की राजनीति का दौर कहा। मंडल कमीशन के आंदोलन के बाद हर जाति के नेता अपनी-अपनी जाति को साधने की राजनीति में लग गए। राजनीति अब जाति नीति की गिरफ्त में आ चुकी थी; जातियां पूरी तरह से अपने अपने नेताओं के खेमे में बंट गयी।
“बोफोर्स दलाली का खुलासा करने के जिन वादों के साथ वीपी सिंह की सरकार सत्ता में आई थी, वे वादे और दलालों के नाम की वह पर्ची जाने कहाँ गुम हो गयी। उसके बदले में निकला “मंडल कमीशन” जो जाने कितनी ही जिंदगियों को लील गया था, और कितनी ही प्रतिभाओं को फूंक चुका था। सिर्फ एक राजनीतिक सनक के चलते वीपी सिंह ने एक विकासशील देश के साथ जो अन्याय किया वह आज भी दंश बनकर देश के युवाओं को लील रहा है।“