एक कहावत है “घर की मुर्गी दाल बराबर” अर्थात अगर कोई वस्तु बिना प्रयास के उपलब्ध हो जाए तो उसकी महत्ता कम ही लगती है। यह बात शिक्षा और योग्यता पर भी लागू होती है, यदि प्रयास और परिश्रम किये बिना ही विद्यार्थियों को वांछित अहर्ता प्राप्त हो जाए तो वे परिश्रम करेंगे ही क्यों? और क्यों ही वे परिश्रम का महत्व भी समझेंगे? हमारे देश में आरक्षण व्यवस्था भी कुछ इसी प्रकार से परिश्रम और योग्यता के महत्व को तेज़ी से नष्ट कर रही है। आरक्षण को लागू करते समय संविधान निर्माताओं ने इस ध्येय को ध्यान में रखा था कि इसके द्वारा पिछड़ों को आगे लाकर समान योग्यता विकसित करने का अवसर प्राप्त होगा, उन्हें एक सहारा दिया जाएगा जिससे वे अपने अंदर छुपी हुई प्रतिभा को निखार कर अन्य वर्गों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। मगर क्या वास्तव में वह उद्देश्य पूर्ण होता दिख रहा है? बिल्कुल नहीं!

एक RTI के जवाब में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा IIM अहमदाबाद में प्रवेश हेतु न्यूनतम अंकों के जो आंकड़े उपलब्ध कराये गए हैं वे न सिर्फ हैरान कर देने वाले हैं बल्कि देश भर में आरक्षण को लेकर एक नई बहस को जीवित कर सकते हैं। 4 फरवरी 2014 को दीपक मेहता द्वारा दायर की गयी RTI याचिका में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से वर्ष 2000 से 2013 के बीच हुए प्रवेशों के संबंध में सभी श्रेणियों के लिए न्यूनतम CAT स्कोर के बाबत जानकारी मांगी गयी थी, जिसके प्रतिउत्तर में मंत्रालय द्वारा जो आंकड़े पेश किये गए उन पर नज़र डालें तो सन 2000 से लेकर 2013 तक सामान्य श्रेणी के छात्रों की कट ऑफ में कोई भी विशेष अंतर् नहीं दिखा, जबकि SC ST श्रेणी के छात्रों की कट ऑफ में 56 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गयी है।

ये आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और निराशाजनक हैं, 2001-03 के बैच में जहाँ SC तथा ST वर्गों की न्यूनतम कट ऑफ क्रमश: 96.15 व 94.52 थी वहीं 2013-15 के बैच में प्रवेश के लिए इन्ही वर्गों की कट ऑफ घट कर क्रमशः 71.26 व 38.34 ही रह गयी। सरल शब्दों में कहा जाए तो आईआईएम जैसे संस्थानों में आरक्षण लागू होने के बाद से आरक्षित वर्गों की प्राकृतिक योग्यता तेजी से घट रही है। जिस वर्ग के छात्र 95 प्रतिशत तक अंक लाने में सक्षम थे वे अब सिर्फ 40 प्रतिशत अंक ला पाने में भी सफल नहीं हो पा रहे। इसके अलावा इस सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के कटऑफ पर गौर करें तो यहाँ भी न्यूनतम प्रतिशत प्रतिवर्ष गिर रही है, प्रस्तुत आंकड़ों पर गौर किया जाए तो IIT/IIM जैसे संस्थानों में OBC आरक्षण लागू होने के बाद से इस वर्ग के छात्रों की कट ऑफ में सिर्फ गिरावट ही देखी गयी है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या आरक्षण वास्तव में पिछड़े वर्गों का उत्थान कर रहा है? अथवा उन्हें कोटा की बैसाखियों के भरोसे परिश्रम से दूर कर उनकी वास्तविक योग्यता को भी छीन रहा है?
आरक्षण व्यवस्था के द्वारा जिस तरह अयोग्यता को बढ़ावा मिल रहा है वह किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए विनाशकारी है। यहाँ हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि किसी भी वर्ग समूह से पिछड़ापन तब ही दूर किया जा सकता है जब उन लोगों की प्राकृतिक क्षमता को प्रोत्साहित कर निखारा जाए। ना कि आरक्षण दे कर उनके पिछड़ेपन को सदा के लिए पिछड़ा पन बनने की भूमिका रची जाए। अगर यही व्यवस्था निरंतर चलती रही तो “योग्यता घर की मुर्गी ही बन कर रह जायेगी” और फिर समाज इसे दृष्टांत मानकर परिश्रम के मार्ग को त्याग देगा, और परिश्रम की यह उपेक्षा राष्ट्र को खोखला कर देगी।