आरक्षण के समर्थन में अक्सर यह कहा जाता है कि आरक्षण उस अन्याय और उत्पीड़न का बदला है, जो पूर्व में सवर्णों द्वारा पिछड़ी जातियों पर किया गया था। जिसे वे affirmative action या सकारात्मक कार्रवाई का नाम देते हैं। वे कहते हैं कि वर्षों से हुई उपेक्षा और अत्याचार का हिसाब बराबर करने के लिए यह जरूरी है कि सवर्णों के हित का एक बड़ा हिस्सा उन्हें मिलना चाहिए, जो कि आरक्षण द्वारा ही संभव है। वैसे तो यह बात सुनने में ही अजीब है कि पूर्वजों के द्वारा किये गए अत्याचार का बदला उनके वंशजों से कैसे लिया जा सकता है? मगर यदि इसे ही affirmative action और सामाजिक न्याय की संज्ञा दी जाति है तो ऐसे कई अन्य क्षेत्र हैं, जहाँ इसके प्रयोग की अधिक आवश्यकता है। इनमें से एक है सवर्ण हिन्दुओं पर वर्षों से किये जा रहे सुनियोजित अत्याचार।

पिछड़े वर्गों के साथ हुए उत्पीड़न का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना बताया जाता है, मगर सवर्ण हिन्दुओं पर किये गए उन अत्याचारों का सच जानबूझ कर अनदेखा किया जाता है, जो विभिन्न समुदायों द्वारा पिछले 1200 वर्षों से लगातार होता आया है। किसी भी समुदाय की संस्कृति के मुख्य आधार उनकी पारिवारिक व्यवस्था, जीवन शैली, शैक्षिक संस्थान और उपासना स्थल होते हैं। हिन्दुओं के इन सभी केंद्रों पर विभिन्न समुदायों द्वारा लगातार आक्रमण किये जाते रहे हैं। अर्थात यदि शोषण की बात करें तो चाहे आर्थिक हो, शारीरिक हो या शैक्षिक हो, हिन्दुओं पर सभी प्रकार से किये गए शोषण के प्रमाण मिलते हैं।

यह उत्पीड़न सन 870 ई. से शुरू हो चुका था जब अरब सेनापति याकूब एलेस ने अखंड भारत के भाग अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया था, इसके बाद यहां के हिन्दुओं का जबरन धर्मांतरण अभियान के रूप में शुरू किया गया, विरोध करने पर पुरुषों को मार दिया जाता था तथा स्त्रियों को अरब भेज दिया जाता था। अरबों के बाद तुर्कों ने भारत पर आक्रमण किया। जिनमें महमूद गजनवी ने इस्लाम के विस्तार और धन, सोना तथा स्त्री प्राप्ति के उद्देश्य से भारत पर 1001 से 1026 ई. के बीच 17 बार आक्रमण किए। महमूद गजनवी ने अपना 16वां आक्रमण (1025 ई.) सोमनाथ पर किया। उसने वहां के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ा और अपार धन लूटा। इस मंदिर को लूटते समय महमूद ने लगभग 50,000 ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का कत्ल किया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1194 ई. में अजमेर के जैन मंदिर एवं संस्कृत विश्वविद्यालय को नष्ट कर उनके मलबे पर क्रमशः ‘कुव्वल-उल-इस्लाम’ एवं ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ का निर्माण करवाया। इसके अलावा उसने दिल्ली स्थित ध्रुव स्तंभ के आसपास को नक्षत्रालयों को तोड़कर बीच के स्तंभ को ‘कुतुबमीनार’ नाम दिया।

हिन्दुओं के सिर्फ धार्मिक व शैक्षिक केंद्रों पर ही हमला नहीं किया गया, बल्कि उनकी हत्याएं भी एक प्रतियोगी लक्ष्य लेकर की जाती थीं, और सबसे ज्यादा हत्याएं करने वाले को उपाधि देकर सम्मानित भी किया जाता था। गयासुद्दीन तुगलक ‘गाजी’ को ‘गाजी’ की उपाधि दी गयी थी, जो काफिरों की हत्या करने वाले को दी जाती है। 1526 ई. में मुगल वंश की स्थापना करने वाले बाबर ने भी घूम-घूमकर उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़ा और उनको लूटा। उसने ही अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद बनवाई थी।

विभिन्न समुदायों द्वारा सवर्ण हिंदुओं पर किए जाने वाले हमलों में मुख्य निशाना ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर ही होता था। हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ा जाता तथा धर्म ग्रंथों को जला दिया जाता था, इसके अलावा पुरुषों की निर्मम हत्या, बच्चों का धर्मांतरण और स्त्रियों का बलात्कार हिन्दुओं पर हुए अत्याचार की वीभत्सता बयान करते हैं। यह उत्पीड़न व अत्याचार ब्रिटिश काल तक जारी था, मिशनरियों की स्थापना तथा ईसाई धर्म के प्रसार के लिए सवर्ण हिन्दुओं के प्रमुख संस्थान ‘गुरुकुल’ को समाप्त करने के निरंतर प्रयास किये जाते रहे।

यदि उत्पीड़न की तुलना भी की जाए तो पिछड़े वर्गों के साथ सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न होने की बात की जाती है; लेकिन सवर्ण हिंदुओं पर जो अत्याचार किए गए थे उनमें सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक उत्पीड़न तो थे ही, साथ ही उन पर उस प्रकार के अत्याचार भी किए गए जो न सिर्फ कष्टप्रद थे बल्कि मन को आतंकित तथा अपमानित करने वाले भी थे। धर्म स्वीकार न करने पर जिंदा जला देना, दीवार में चुनवा देना, आरी से काट डालना तथा गर्म सलाखों से आंखों व शरीर को दागना आदि उस काल में आम बात थी; इसके अलावा हिन्दू स्त्रियों के साथ किए जाने वाले अत्याचार व्यक्त करने योग्य भी नहीं है।

प्रश्न यह उठता है कि यदि मंदिरों में प्रवेश ना देना उत्पीड़न है, तो मंदिरों को लूट कर तोड़ देना और पुजारियों का नरसंहार उत्पीड़न क्यों नहीं? यदि धर्मग्रंथों को छूने से वंचित करना अत्याचार की श्रेणी में आता है तो शिक्षा के केंद्रों को जलाकर, धार्मिक पुस्तकों को नष्ट कर देना अत्याचार क्यों नहीं? यदि छुआछूत और ऊंच-नीच को आधार बनाकर आरक्षण दिया जाना न्यायपूर्ण है, तो धर्म के नाम पर निशाना बना कर की गई हत्याओं और शोषण को आरक्षण का आधार क्यों नहीं बनाया जा सकता? यदि सिर्फ जातिगत भेदभाव के कारण सकारात्मक विभेद की कार्यवाही तर्कपूर्ण है तो फिर धार्मिक घृणा, उत्पीड़न, अत्याचार, हत्याएं और बलात्कार को लेकर सकारात्मक कार्यवाही कब होगी?

अगर पूर्व में हुए अत्याचार और शोषण को आधार बनाकर ही वर्तमान व्यवस्था चलाई जाएगी तो इतिहास के गर्त में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनसे लगभग हर जाति ही उत्पीड़न की शिकार पायी जायेगी; और इस तरह हर जाति ही आरक्षण पाने की हकदार भी होगी। इसलिए यह वह समय नहीं जब हम इतिहास में हुए अन्याय के आधार पर वर्तमान के न्याय को दूषित करें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि दलितों और पिछड़ों के साथ हुए अन्याय उस काल में हुए थे ,जब भारत में राजशाही व्यवस्था थी । अब भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसमें सभी को उन्नति एवं प्रगति करने का समुचित अवसर दिया जाता है। भेदभाव और छुआछूत के लिए कड़े कानून हैं, किसी भी नौकरी में कोई भी उत्तराधिकार व्यवस्था नहीं है, फिर भी यदि कुछ जातियों को विशेष आरक्षण प्रदान किए जाते रहेंगे , तो यह उसी कलुषित व्यवस्था का ही एक उदाहरण होगा और इसे किसी भी रुप में सही नहीं ठहराया जा सकता। हमें एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें सभी जातियों को समान समझकर न्याय किया जाए।