भारत में आरक्षण को लेकर चल रही लड़ाई का एक लम्बा इतिहास रहा है। विभिन्न आंदोलनों और प्रदर्शनों से ऊपर, आरक्षण को लेकर कई कानूनी वाद प्रमुख रूप से चर्चित रहे हैं। जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण मामलों की सूची इस प्रकार है:

The State Of Madras vs Srimathi Champakam 1951
मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपकम 1951
1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने एक जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था। जिसे 1951 में मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपकम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय के अनुसार जाति आधारित आरक्षण अनुच्छेद 15 (1) का उल्लंघन है। इस निर्णय के परिणामस्वरुप संविधान की धारा 15(4) में संशोधन किया गया, जिससे राज्य को यह अधिकार प्राप्त हुआ कि वह सामाजिक अथवा शैक्षिक दृष्टि से दो पिछड़े हुए वर्गों के नागरिकों के लिए अथवा अनुसूचित जातियों और जनजातियों की उन्नति के लिए कोई विशेष व्यवस्था कर सकता है।

M. R. Balaji And Others vs State Of Mysore 1963
एमआर बालाजी व अन्य बनाम मैसूर राज्य 1963
एम. आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य 1963 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पिछड़े वर्ग में वर्गीकरण असंवैधानिक है, कोई विशेष वर्ग पिछड़ा वर्ग है या नहीं? इसके निर्धारण के लिए व्यक्ति की जाति ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती है। इसके निर्धारण के लिए आर्थिक दशा, निर्धनता, पेशा, निवास स्थान आदि पर भी ध्यान देना चाहिए। बालाजी बनाम मैसूर राज्य के मामले में सरकार के एक आदेश, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 68 फीसदी सीटें आरक्षित की गई थीं, को ज़रूरत से ज़्यादा मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया और यह माना कि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आरक्षण के लिए जाति अपने आप में कोई आधार नहीं बन सकती। उसमें दिखाना होगा कि पूरी जाति ही शैक्षणिक और सामाजिक रूप से दूसरी जातियों से पिछड़ी है।
T.Devadasan vs The Union Of India 1963
टी. देवदासन बनाम भारत संघ 1963
सुप्रीम कोर्ट ने 1963 में बालाजी बनाम मैसूर राज्य के मामले में सरकार के एक आदेश, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 68 फीसदी सीटें आरक्षित की गई थीं, को ज़रूरत से ज़्यादा मानते हुए ख़ारिज कर दिया और माना कि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने टी देवदासन बनाम भारतीय संघ के मामले में भी इस फैसले को दोहराया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पिछड़े वर्गों के दावों और अन्य नागरिकों के बीच उचित संतुलन की ज़रूरत है।

R. Chitralekha & Anr vs State Of Mysore & Ors 1964
आर चित्रलेखा बनाम राज्य मैसूर और अन्य 1964
चित्रलेखा बनाम मैसूर ( AIR 1964 SC 1823 ) के मामले में अवधारित किया गया कि हालांकि जाति किसी वर्ग के पिछड़ेपन का सुनिश्चय करने के लिए एक प्रासंगिक कारण है, किंतु इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जो संबंधित प्राधिकारी को नागरिकों के किसी वर्ग के विशेष पिछड़ेपन का निर्धारण करने से रोकती हो, बशर्ते वह जाति के हवाले के बिना ऐसा कर सकता है।

State Of Andhra Pradesh And Ors vs U.S.V. Balram Etc 1972
आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य बनाम यूएसवी बलराम आदि 1972
आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य बनाम यू.एस.वी. बलराम इत्यादि के मामले में पिछड़े वर्गों की एक सूची जिसे चुनौती दी गई थी पूर्व जातियों के आधार पर तैयार की गई थी। न्यायालय ने पाया कि जाति चिह्न आयोग द्वारा विशेष रूप से संदर्भित व्यवसायों या व्यवसायों के समूह का वर्णन है। यहां तक कि इस धारणा पर कि सूची विशेष रूप से जाति पर आधारित है, आयोग के समक्ष सामग्री और इसकी रिपोर्ट में दिए गए कारणों से से स्पष्ट था कि पूरी जाति सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी है और इसलिए, पिछड़ा वर्गों की उप-जाति की सूची का समावेश धारा15 (4) द्वारा समर्थित है। सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए जाति कसौटी ही रहेगी।

K.C. Vasanth Kumar & Another vs State Of Karnataka 1985
के.सी. वसंत कुमार और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य 1985
के मामले में न्यायलय ने अवधारित किया कि यदि आरक्षण केवल उन पिछड़े वर्गों या धाराओं के पक्ष में किया जाता है जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के बराबर हैं, तो कर्नाटक राज्य में इस तरह के पिछड़े वर्गों की कुल जनसंख्या को देखते हुए यह 50% से अधिक नहीं होगा (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित आरक्षित और 15% ‘विशेष समूह’)।

Indira Sawhney vs the Union Of India 1992
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ 1992
इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम केंद्र सरकार (यूनियन ऑफ़ इंडिया) में सर्वोच्च न्यायालय (AIR) 1993 SC 477: 1992 Supp (3)SCC 217 ने केंद्रीय सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए अलग से आरक्षण लागू करने को सही ठहराया।
1992 में पहली बार इंदिरा साहनी केस में कहा गया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रमोशन में रिजर्वेशन अनुमन्य नहीं है। संसद ने इस पर विचार किया और 77वां संविधान संशोधन आया। उस संशोधन में कहा गया कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को यह अधिकार है कि वह प्रमोशन में भी आरक्षण दे सकती है। यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में गया और उसने कहा कि ठीक है, आरक्षण तो दे सकते हैं, लेकिन वरिष्ठता नहीं मिलेगी। उसके बाद 85वां संविधान संशोधन उसी संसद से पास हुआ और यह कहा गया कि कॉनसीक्वैंशियल सीनियॉरिटी भी दी जायेगी। इन्दिरा साहनी प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की जजों वाली संविधानिक पीठ ने दिनांक 16.11.1992 को संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजकीय संवाओं में पदोन्नति में आरक्षण को सही नहीं माना तथा यह आदेश दिया कि इन वर्गों को पदोन्नति में आरक्षण केवल अगले 5 वर्ष तक ही यथावत रखा जाएगा।
M. Nagaraj & Others vs Union Of India & Others 2006
एम नागराज और अन्य बनाम भारत का संघ और अन्य 2006
उच्चतम न्यायालय के समक्ष 77वें व 85वें संविधान संशोधनों को सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों द्वारा चुनौती दी गयी। उच्चतम न्यायालय ने दिनोंक 19-10-2006 को एम.नागराज प्रकरण के नाम से अपना निर्णय दिया। जिसमें इन संवैधानिक संशोधनों को तो सही माना किन्तु कहा कि सरकार अनुसूचित जाति, जनजाति के वर्गों के कर्मियों को पदोन्नति में आरक्षण देना चाहती है तो इस हेतु उसे इन वर्गों के पिछड़ेपन, राजकीय सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व एवं सरकार के काम की दक्षता पर प्रभाव के संबंध में आंकड़े एकत्रित कर आधार तैयार करना होगा।
एम. नागराज केस में कहा गया कि 77वां संविधान संशोधन और 85वां संविधान संशोधन, दोनों संवैधानिक हैं, लेकिन किसी भी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को अगर प्रमोशन में आरक्षण देना है, तो तीन बातें अवश्य देखनी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। एक, इन वर्ग के लोगों में आज भी पिछड़ापन है या नहीं? दूसरा, इस वर्ग के लोगों का सेवाओं में सक्रिय प्रतिनिधित्व है या नहीं? तीसरा, अगर अनुसूचित जाति, जनजाति के अधिकारी और कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दिया जाता है, तो यह भी अध्ययन कराना होगा कि क्या प्रशासन पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा?