आज़ादी के बाद से अब तक आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर पक्ष विपक्ष में चर्चाएं तो होती हैं, मगर समाधान के बिना ही समाप्त हो जाती हैं। कोई इसके जातिगत होने के पक्ष में समर्थन देता है, तो कोई इसे आर्थिक आधार पर लागू करने की बात करता है। आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण भले ही एक वरदान हो मगर वास्तविकता में आरक्षण एक भयंकर महामारी की तरह फ़ैल चुका है। कहना अतिशयोक्ति न होगा मगर देश अब पूरी तरह इस महामारी की चपेट में आ चुका है। समानता, अधिकार और प्रतिनिधित्व की अभिलाषा से शुरू की गई ये विभाजनकारी पहल ही अब असमानता, वंचितता और पिछड़ेपन का कारण बन चुकी है। बात जातियों को एक साथ उन्नति पथ पर लाने को लेकर शुरू हुई थी किन्तु अब जातियों में एक दूसरे के प्रति घृणा का जो स्तर है वह बेहद चिंताजनक है। आरक्षण ने देश में वह माहौल उत्पन्न कर दिया है, जिसमें अकर्मण्यता और अयोग्यता के पुरस्कृत होने से परिश्रम तथा पात्रता हतोत्साहित हो रही है और युवा अवसर व लाभों में हिस्सा पाने के लिए अन्य साधनों की तलाश में उलझ रहे हैं। कभी वे रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के जरिये सफलता का रास्ता ढूंढते हैं, तो कभी नकल और धोखाधड़ी की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इन सबके अलावा एक और रास्ता लोगों ने खोज निकाला है। वह है खुद ‘आरक्षण’।
अब आरक्षण पीड़ित खुद आरक्षण चाहते हैं, यह सुनने में अजीब है मगर सच है। यह वह समय है जब हर जाति-उपजाति समूह एकत्रित होकर अपने अधिकारों के बहाने अपने लिए आरक्षण की मांग करते हैं, इसके लिए वे आंदोलन का मार्ग चुनते हैं और इसे बेहद सुनियोजित ढ़ंग से उग्रता की ओर मोड़ दिया जाता है। ऐसे में या तो सरकार द्वारा उनकी मांगें मान ली जातीं हैं, अथवा उनकी मांग एक चुनावी मुद्दा बन जाती है। और उस जाति का वोट उनकी मांग पूरी करने की शर्त में उनके नवनेता के हाथ में बंध जाता है। चाहे राजस्थान का गुर्जर आंदोलन हो, हरियाणा का जाट आंदोलन हो या गुजरात का पटेल आंदोलन। सभी का सार यही है कि देश के युवाओं का एक विशाल भाग अब परिश्रम की बजाय आरक्षण के जरिये सफलता पाने की अभिलाषा पाल रहा है, जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

आरक्षण के समर्थन में यह मान लिया जाता है कि पिछड़ी जातियों का हर व्यक्ति कमजोर है और सामान्य वर्ग का हर व्यक्ति अपने आप में समर्थवान है; जिससे वह अच्छी से अच्छी शिक्षा और रोजगार पा सकता है। आरक्षण द्वारा कम परिश्रम में मिलने वाले लाभों ने युवाओं को इतना आकर्षित किया है कि वे अब प्रतिभाशाली होने से ज्यादा आरक्षित श्रेणी का होने में अधिक प्रसन्नता अनुभव करते हैं, जो किसी भी प्रगतिशील देश के लिए भयंकर चिंता का विषय है। आज़ादी के बाद से अब तक दलितों को मिलते आ रहे आरक्षण से कितना लाभ हुआ, कितना उन्हें समानता का अनुभव हुआ ये किसी से छिपा नहीं हैं।
स्वयं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का इस संदर्भ में कहना है कि “अब दलितों को लगता है कि उन्हें बराबरी के लिए ख़ुद संघर्ष नहीं करना है बल्कि सरकारें उन्हें बराबरी दिलाएंगी। इसलिए बराबरी के लिए संघर्ष करने के बजाए दलित आरक्षण के लिए लालायित रहते हैं। श्री काटजू का कहना है कि “इसमें कोई शक़ नहीं है कि जातिगत आरक्षण ने दलितों को चुनावों का वोट बैंक बनाने में मदद की है जिसे धूर्त नेता अपनी मनमर्ज़ी से चलाते हैं”। पूर्व चीफ जस्टिस पूछते हैं कि “लेकिन कितने दलितों को आरक्षण से फ़ायदा हुआ है? एक प्रतिशत को भी नहीं। लेकिन ऐसे आरक्षण ने दलितों को अलग-थलग कर दिया है और उच्च जातियों में भी उनके प्रति द्वेष पैदा किया है।”
यथार्थ भी यही है। यदि आरक्षण से पूर्व दलितों के शोषण की बात की जाती है; तो यह भी मानना होगा कि आरक्षण के बाद से दलित समाज के प्रति अन्य अनारक्षित जातियों के मन में द्वेष उत्पन्न हुआ है, जो कि निरंतर बढ़ ही रहा है। देश का युवा समुदाय काफ़ी हद तक दो परस्पर-विरोधी हिस्सों में बँट गया है। अस्थायी नौकरियों पर आश्रित, मध्यवर्गीय, सवर्ण जातियों के छात्रों और बेरोज़गार युवाओं को लगता है कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे दलित और पिछड़ी जातियाँ उनके रोज़गार के रहे-सहे अवसरों को भी छीन रही हैं।
बिना ज्ञान के अगर कोई ऊँचे पद पर सिर्फ़ जातिगत प्राप्त सुविधा के हिसाब से जाता है तो वह वहां पर काम करेगा भी कैसे? क्यूँकि बिना योग्यता के पद तो पाया जा सकता है लेकिन उसके पश्चात जिन उत्तरदायित्वों का के निर्वहन की अपेक्षा होती है, वह बिना योग्यता के संभव नहीं! जिससे तंत्र और समाज दोनों का नुकसान होता है। जब सम्पूर्ण विश्व समानता का अवसर देने की तरफ बढ रहा है और उम्र, रंग, धर्म, जाति अथवा लिंग के आधार पर भेदभाव को नकार रहा है तब अपने देश में ऐसी विभाजित करने वाली व्यवस्था का सर्मथन उचित नहीं है। और ऐसी नीतियों का हमारे देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा जबकि आईटी, कंसलटेंसी और फाईनेंशियल सेवाओं जैसे प्रतियोगी क्षेत्रों में कुशल से कुशल और योग्य व्यक्ति आवश्यकता होती है? क्या कोई भी उद्यमी ऐसे व्यक्ति के औसत कार्य को स्वीकार करेगा जिससे एक प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षा मिली और फिर रोजगार? क्या देश का हर एक नागरिक ऐसे डाक्टर या वकील पर भरोसा करेगा, जिसे आरक्षण के आधार पर शिक्षा मिली हो? इतिहास में हुई बातों का हवाला देकर देश को दीमक की तरह खोखला किया जा रहा है।
जातिवाद अब सिर्फ़ एक राजनैतिक समस्या है। स्कूल में पढने वाले बच्चे अपने सहपाठी कि जाति नही जानते। सिर्फ़ उसे अपना मित्र समझते है। बड़े शहरों में बहुमंजिला इमारतों में सभी जातियों के लोग सदभाव से रहते है। जातिवाद स्वतः ही धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। परन्तु जाति के सहारे सत्ता का लालच देख रहे लोग उसे खत्म नही होने देंगे क्यूँकि ये लोग जानते है कि अगर शोर ना मचाया तो कुछ पीढ़ियों के बाद आने वाली सन्तति भूल जायेगी कि जाति क्या होती है। परन्तु इन लोगो को भय है कि समाज के जागृत होने से आरक्षण का मुद्दा हाथ से ना निकल जाए और जाति के नाम पर चलने वाले वोट बैंक समाप्त ना हो जाएँ। ऐसे लोग अपने ख़ुद के उद्धार के लिए जातिवाद को जीवित रखने का प्रयास कर रहे है।

“अब आवश्यकता है कि समाज का प्रबुद्ध वर्ग आगे आकर, आरक्षण की पुनः समीक्षा करे और तय करे कि क्या सामाजिक उत्थान सिर्फ आरक्षण से ही संभव हो पायेगा? समय है कि देश में आरक्षण पर चर्चा का उद्देश्य राजनैतिक न हो बल्कि निष्पक्ष सामाजिक कल्याण हो। प्रयास जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए किये जाएं न कि जातियों को वोटबैंक बनाने के लिए। हमें विकासशील देश के तमगे को ढ़ोते हुए बहुत वक्त बीत चुका और अब समय विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होने का है, ऐसे में हमें सभी विकास विरोधी तत्वों से मुक्त होकर एक प्रगतिशील और समान पहचान वाले समाज की आवश्यकता है।“