आरक्षण के संदर्भ में पहले सिद्धांत को देखें तो यह बिलकुल विपरीत दशा प्रस्तुत करता है: आरक्षण को उन्ही लोगों द्वारा निर्धारित किया गया जो इसका राजनैतिक लाभ लेना चाहते हैं। अगर आरक्षण देना एक न्याय है तो इसे न्यायिक प्रक्रियाओं से गुज़रना आवश्यक था। इसके सभी पहलुओं को लेकर व्यापक तर्क-वितर्क और आधारों का अध्ययन किया जाना आवश्यक था, मगर ऐसा नहीं किया बल्कि इसे लागू करने का अधिकार उन राजनेताओं को दे दिया गया जो कि स्वयं ही जाति आधारित राजनीति कर सत्ता प्राप्त करते हैं। ऐसे में यह कैसे संभव है कि कोई सरकार आरक्षण लागू करते समय राजनैतिक लाभों और जातिगत पूर्वाग्रहों से प्रेरित नहीं होगी?

अतीत में हुए शोषण और पिछड़ेपन का मूल्याङ्कन और क्षतिपूर्ति प्रदान करने को लेकर विचार का अधिकार न्यायालय के पास होना चाहिए था, जिसमें उचित तर्क और प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते और आरक्षण को राजनैतिक लाभ की विषयवस्तु बनाने से बचाया जा सकता था।

प्राकृतिक न्याय का दूसरा सिद्धांत कहता है कि “दूसरे पक्ष की दलील को सुने बिना निर्णय नही दिया जायेगा” मगर आरक्षण के मामले में सिर्फ आरक्षित श्रेणियों का लाभ देखा जाता है, सामान्य वर्ग का पक्ष सुनना तो दूर उन्हें होने वाली हानि व कठिनाइयों पर विचार भी नहीं किया जाता। इसके लिए सरकार सिर्फ मंशा दिखाती है और 4-5 लोगों का आयोग गठित कर आरक्षण को लागू करने का निर्णय ले लिया जाता है। अर्थात करोड़ों लोगों की शिक्षा और रोजगार का फैसला 4-5 लोगों की अनुशंसाओं के आधार पर ले लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्य वर्ग के लोगों को अपनी आपत्ति व्यक्त करने, अपना पक्ष रखने और अपनी आवश्यकताओं के बारे में बताने का कोई अवसर नहीं मिलता।
आरक्षण लागू हो जाने के बाद ही सामान्य वर्ग के लोगों को यह विकल्प मिलता है कि वे न्यायालय जा कर अपने लिए न्याय की मांग कर सकें। मगर यह मांग भी परिणामहीन ही सिद्ध होती है क्यों कि न्यायिक प्रक्रियायों में खर्च होने वाली राशि सभी के लिए वहन करना आसान नहीं होता, तथा सरकार के विरुद्ध लम्बी न्यायिक प्रक्रिया को भी लोग निरंतर जारी नहीं रख पाते और हौसला तोड़ देते हैं। इतना ही नहीं उन्हें आरक्षित वर्गों के द्वेष का भी सामना करना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती। ऐसे में समुचित न्याय की उम्मीद स्वप्न के समान है। सामान्य वर्ग का पक्ष सुने बिना उनपर कोई भी कठोर निर्णय थोप देना ना सिर्फ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है बल्कि मानवाधिकार का भी हनन है।

भारतीय संविधान न्याय प्रदान करता है: सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जो प्राकृतिक न्याय की अवधारणा का हिस्सा है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किए बिना प्राकृतिक न्याय की कई विशेषताएं शामिल हैं। प्राकृतिक न्याय की भारतीय अवधारणा व्यक्तियों के बीच समानता के पक्ष में है। प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के समानता के उल्लंघन के बराबर है। लेकिन भारत में विशेष वर्गों के लिए रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था प्राकृतिक न्याय और समानता की अवधारणाओं का खुला उल्लंघन करती है।

सिर्फ प्राकृतिक न्याय ही नहीं, आरक्षण नैतिक न्याय का भी उल्लंघन करता है क्योंकि यह अयोग्य को स्वीकार कर योग्य की उपेक्षा का समर्थन करता है। अधिक क्षमता, बुद्धि और समर्पण होने के बाद भी समाज के कुछ वर्गों को अवसर से वंचित रखा जाता है, जबकि कम क्षमता, अलप संकल्प और अल्प महत्वाकांक्षा वाले लोगों को ये अवसर बिना प्रयास के ही उपलब्ध हो रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से प्राकृतिक न्याय का मज़ाक ही है। जब अक्षम लोग सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में कुशल लोगों की जगह लेते हैं, प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को और विकृत कर दिया जाता है।

भारत में प्राकृतिक न्याय का प्रचलन सुनिश्चित करने के लिए, सभी प्रकार के आरक्षण को हमारे सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से हटा दिए जाने की आवश्यकता है। साथ ही ऐसे किसी भी विशेष लाभ लो प्रदान करने की प्रक्रिया न्यायालय से होकर गुज़रनी चाहिए, जिससे सभी वर्गों को अपना पक्ष रखने का अवसर प्राप्त हो सके। ऐसा करने के लिए, भारतीय राजनीति को परिपक्व होने और वोट बैंक की राजनीति से परे सोचने की जरूरत है। साथ ही, आरक्षण प्रणाली के लाभार्थियों को भी इस तथ्य का एहसास होना चाहिए कि व्यवस्था उनके कौशल विकास और व्यक्तित्व विकास हेतु है, आरक्षण प्रदान कर सफलता के शॉर्टकट बनाने के लिए नहीं।